अद्भुत है प्रकृति का संगीत

अद्भुत है प्रकृति का संगीत


पशु-पक्षी का संग तरुवर की छाया, अद्भुत है वो संगीत जो वन में पाया ।

अंतिम पंक्ति में, मैं दो शब्द “मन में” जोड़ रहा हूँ-अद्भुत है वो संगीत जो वन में “मन में” पाया (अंतस में पाया)। वन के, प्रकृति के इस अद्भुत संगीत को सुनने समझने के लिए, इसे अंतरतम में उतारने के लिए भाव की आँख जरूरी है। इसे महसूस करने, देखने के लिए विशेष क्षमता चाहिए। जिम्बाब्वे की सुकूनकारी प्राकृतिक छटा देख कर मुझे इस तथ्य की सच्चाई की कुछ झलक मिली, कुछ अनुभूति हुई।

ज़िंबाब्वे के हरारे शहर में हिन्दू सोसायटी ने सिल्वर जुबली मनाई। इसके अंतर्गत आयोजित कंसर्ट में मुझे आमंत्रित किया गया। खुबसूरत शहर, खुबसूरत मंदिर, सहृदय, सुन्दर श्रद्धालुजन, बड़ा आनंद रहा। दो हजार से अधिक भजन रसिकों के बीच भक्ति गंगा बहती रही, वे इसमें भीगते रहे, आनंद की लहरें उठती रही, अद्भुत आनंद…

अब इधर अन्य प्रकार के एक आनंद को भी समझें- यदि मैं सच कहूँ तो ज़िंबाब्वे की प्राकृतिक छटा, वहां के वन, झरनों के सानिध्य में जो आनंद मिला वह भी अपने आप में बहुत अद्भुत था। सच ही कहा गया है कि प्रकृति के कण कण पर ईश्वर की छाप है, पत्ते पत्ते पर उसके हस्ताक्षर हैं। पर फिर वही बात कि इसे देखने के लिए भाव की आँख ही जरूरी है, आपकी आंतरिक तैयारी, आतंरिक शुचिता जरूरी है।
यदि हम भीतर से शून्य हैं, भीतर से शांत हैं, मौन हैं तो हमें प्रकृति का महा संगीत सुनाई देगा। भीतर हृदय में यदि कोलाहल है, शोर है तो इसे नहीं सुन पायेंगे। मौन यानी केवल बाहर से चुप होना ही नहीं है। मौन का अर्थ भीतर से भी विचारशून्य, निश्चेष्ट होना है। ऐसा शून्य हृदय खाली गागर समान है. ऐसी गागर में ईश्वर रुपी सागर उतर आएगा. ऐसे हृदय में ही ईश्वर कृपा की अनुभूति होती है।

ज़िम्बाब्वे में जब झरने, वन, वहां की प्राकृतिक शांति का संग मिला तब ह्रदय को बहुत सुकून मिला, अद्भुत शांति की अनुभूति हुई। ऐसे में सच जानिए हृदय में जीवन संगीत बज उठता है, ईश्वरानुभूति की वीणा झंकृत होने लगती है। आत्मा का नाद सुनाई पड़ने लगता है।
धन्यवाद हरारे, धन्यवाद हिन्दू सोसायटी; बहुत बहुत आभार।
ईश्वर अवसर दे ! फिर आना चाहूँगा।

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