भजन सम्राट अनूप जलोटा जी की आत्मकथा ‘मेरी कहानी मेरी ज़ुबानी’ को लेकर संगीत प्रेमियों में उत्सुकता...

“मेरी कहानी, मेरी जुबानी…”


आज जब मैं अपनी बीती ज़िंदगी की ओर मुड़ कर देखता हूँ तो मन में बरबस कृतज्ञता का भाव जाग उठता है। कितने लोग, कितने प्रदेश, कितने विविध प्रकार के अनुभव! कभी कभी तो अचरज होता है – क्या एक इन्सान एक ही जीवन में इतने समृद्ध अनुभवों का भाग्य पा सकता है? क्या मैं ही वो हूँ जो इतनी भरीपूरी ज़िन्दगी जिया हूँ?

सबसे पहले तो मेरा जन्मस्थल… देव-भूमि उत्तराखंड में मनोरम प्राकृतिक सौंदर्य से सजे नैनीताल में मेरा जन्म हुआ। तभी शायद ईश्वर ने मेरे नन्हे से कानों में कल-कल करते झरनों से और चिड़ियों के चहचहाने से पहले अमृत स्वरों का संस्कार किया। और फिर जन्म भी ऐसे वंश में हुआ जहाँ संगीत सांस लेने जितना ही आवश्यक था। पंजाब के शाम चौरासी घराने से जुड़े मेरे पिताजी श्री. पुरुषोत्तम दास जलोटा जी एक अती उच्च दर्जे के और लोकप्रिय भजन गायक थे। भक्तिभाव के रसपरिपोष से युक्त भजनों को विश्व के कोने कोने में श्रोताओं तक पहुँचाने का मेरा भागधेय वहीं पर लिखा गया था । लखनऊ के पं. भातखंडे संगीत महाविद्यालय में और फिर पिताजी के मार्गदर्शन में गायन कला के गुर सीखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आगे भी मधुमक्खी के भाव से कई महानुभाव गायकों के मार्गदर्शन में सीखता रहा, संगीत कला के परागकण जमा करता रहा। लेकिन सफलता का सुमधुर छत्ता इतनी आसानी से भी नहीं मिला। संघर्ष तो करना ही पडा। आज सोचता हूँ तो समझ में आता है की वह भी भाग्य की ही बात थी। क्योंकि अनुभव से बड़ा कोई गुरु नहीं होता। संघर्ष के उन्हीं दिनों में मैं अपनी आत्मा की आवाज खोज पाया। आल इंडिया रेडियो पर कोरस गायक के रूप में सांगीतिक सफ़र की शुरुआत की थी। उसके बाद कई अच्छे बुरे पड़ाव जीवन में आए लेकिन साथ में थी दिल में संगीत की असीम लगन, मन में जीवन के प्रति आस्था और खूब मेहनत करने का जज्बा! ये सब बातें और संगीत प्रेमियों के अपरिमित प्रेम का ही नतीजा था एक दिन दुनिया मुझे प्यार से ‘भजन सम्राट’ नाम से जानने लगी। भारत सरकार ने ‘पद्म श्री’ से नवाजा। देश और विश्व के लगभग हर कोने में सांगीतिक प्रस्तुति देने का अवसर मिला। समृद्धि, सफलता, लोकप्रियता … ईश्वर की कृपा और रसिकजनों के प्रेम से सभी कुछ प्राप्त हुआ। लेकिन इन सब बातों को बड़ी नम्रता से आशीष के रूप में स्वीकार किया… मीरा, कबीर, सूर, तुलसी का आशीष।

भजन गायन के साथ और भी एक विधा में रसिकजनों की सेवा करने का अवसर मिला… वो है ‘ग़ज़ल’। देश विदेश के ऊंचे शायरों की शायरी को मौसिकी के ज़रिये पेश किया और ढेर सारा प्यार तथा स्वीकृति पाई। फिल्मों के लिए गाने गाएं… फिल्मों की निर्मिती भी की।
इस लम्बे और रोमहर्षक सांगीतिक सफ़र में कई अच्छे बुरे लोगों से मिलना हुआ। अच्छों की सूचि इतनी लम्बी है कि भाग्यवश जो बुरे लोग आए, उन्हें याद रखना जरूरी नहीं समझा। जिनका मेरे जीवन, मेरी सफलता में महत्वपूर्ण हाथ है, उन्हीं में से एक मेरी सखी, सचिव, प्रेमिका, पत्नी मेधा… आज उसे साथ छोड़कर परलोक सिधारे 3 वर्ष हो गए लेकिन एक क्षण ऐसा नहीं की वो मेरे साथ नहीं…। आज भी उसके बारे में लिखते हुए आँखें बरबस भर आती हैं। अब साथ में है तो अर्यमान…. हर समय उसकी माँ की याद दिलाता..। उसके साथ हर सुबह जीवन का एक नया सुहावना तोहफा लगती है।

बीती बातों को याद करते हुए कई रंग बिखरे हुए नजर आते हैं, कई हसीं लम्हें नजर आते हैं, कई संपन्न अनुभव दिल को छू जाते हैं। पांच दशकों के इस सांगीतिक सफ़र में आपका प्यारा साथ हमेशा रहा। संगीत के इस सागर में जितने भी हसीन मोती हाथ आए, सारे आप की महफ़िल में लुटाए। और प्रतिफल में पाया असीम प्रेम। आपका यह प्रेम ही मेरे जीवन की असली कमाई है। इसीलिए सोचा की संगीत तो आपके साथ सांझा किया ही है, अब जीवन भी सांझा कर लूं! इसी लिए आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ अपनी आत्मकथा – ‘मेरी कहानी, मेरी जुबानी’। हर भजन, हर गाने के बाद आपने अपनी प्रतिक्रिया, प्रशंसा … और हाँ कभी कभार आलोचना भी… खुले मन से व्यक्त की है। विशवास है कि उसी प्रेम, स्नेह और मर्मज्ञता से श्री. सुधीर जोशी जी द्वारा शब्द बद्ध की गई ‘मेरी कहानी, मेरी जुबानी’ का स्वागत कैसे करेंगे। आपकी प्रतिक्रियाओं का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा।

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